सर्वश्रेष्ठ यंत्र : श्री यंत्र

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श्री यंत्र समस्त यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। यह भगवती श्री त्रिपुर संदुरी का यंत्र है। ‘योगिनी हृदय’ ग्रंथ के अनुसार आद्या शक्ति अपने बल से ब्रह्माण्ड का रूप लेकर स्वयं अपने स्वरूप को निहारती हैं तो वहीं से ‘श्री चक्रों’ का प्रादुर्भाव होता है।

 

 “श्री” यंत्र के केन्द्र में बिंदु है। इस बिंदु के चारों ओर 9 त्रिकोण हैं जो नवशक्ति के प्रतीक हैं। 5 त्रिकोण को शक्ति स्वरूप माना जाता है। ये (पांच त्रिकोण) पंच प्राण, पंच ज्ञानेन्द्रियां, पंच कर्मेन्द्रियां, पंच तन्मात्रा और पंच महाभूत का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीचे के चार त्रिकोण शिव स्वरूप माने जाते हैं। ये शरीर में जीवात्मा, प्राण, मज्जा और शुक्र को परिलक्षित करते हैं और मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के द्योतक हैं। इस तरह से ये 9 त्रिकोण 9 मूल प्रकृति का प्रतीक हैं। इसके पश्चात इस यंत्रराज में पहले वृत्त के बाहर आठ दल का कमल और उसके पश्चात इस वृत्त के बाहर 16 दल का कमल है।

इस यंत्र में उर्ध्वमुखी त्रिकोण, अग्नितत्व का, वृत्त वायु का, बिंदु आकाश का और भूपुर पृथ्वी तत्व का प्रतीक हैं। कुल मिलाकर यंत्रराज यंत्र स्वयं में मानव शरीर का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि इस प्राणप्रचलित चैतन्य महायंत्र के सामने धनतेरस या दीपावली से आरंभ करके नित्य 16 पाठ श्री सूक्त के किए जाएं तो यह यंत्र धीरे-धीरे जागृत होने लगता है।

इस यंत्र की महिमा जग प्रसिद्ध है। समस्त मठों और मंदिरों में इस यंत्रराज का पूजन अवश्य किया जाता है जिससे उनका वैभव अक्षुण्ण रहता है। सोमनाथ मंदिर में प्रत्येक ईंट पर यह यंत्र स्थापित था, जिसकी वजह से वहां अकूत सम्पदा थी, जिससे महमूद गजनवी ने उसे बार-बार लूटा, ऐसी मान्यता है।

कहा जाता है कि आज भी समस्त ऐश्वर्यशाली पीठों में इसका पूजन अवश्य किया जाता है। दीपावली के दिन सम्पूर्ण विधि से इस यंत्र को स्थापित कर इसके समक्ष पूरी श्रद्धा व क्षमता के साथ श्री सूक्त का पाठ व लक्ष्मी मंत्र या बीज मंत्र का जाप करने वाला समस्त वैभव को प्राप्त करता है ऐसा ग्रंथों का कथन है।

 

 

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